Monday, October 12, 2009


आखिर यह क्या है…...................आशुतोष जार्ज मुस्तफा।
गांधी मैदान में आपका गिल्लोवाला पेड़ गिर गया है। यह पहली लाईन थी उस सुबह की जिस दिन पटना में जमकर आंधी के साथ बारिश हुई थी। यह मेरे कार्यालय के एक लड़के ने हंसते हुए मुझसे कहा था। फिर क्या था दौड़कर मैं गांधी मैदान पहुंचा। मैने देखा कि वह पेड़ नहीं बल्कि पास का एक यूक्लिप्टस का पेड़ गिरा हुआ है। उसके कहने के बाद मेरे दिमाग ने यह सोचने की जहमत नहीं उठाई की बरगद का पेड़ कमजोर आंधी में नहीं उखड़ता। उसके बाद मैं सोचने लगा आखिर यह क्या है। यह कहीं प्यार तो नहीं और है भी तो कौन सा। वह एहसास वाला प्यार जो हाथों को जीभ से छुने पर जगा है या फिर शरीर के वो मुलायम बाल। क्योंकि हथेली के बिस्कुट जब खत्म हो जाता है तो वे उंगलियों के बीच जीभ डालकर उसके बिस्कुट के बुरादें निकालती हैं। और इस दौरान जो गुदगुदाहट होती है उस अदभूत एहसास को मैं शब्दों में नहीं पिरो सकता। प्यार भी ऐसा जो तथाकथित आज के एम क्यू जैसा नहीं है। कुछ लोग कहते हैं कि जिसके पास एम क्यू हो उसे ही आजकल प्यार मिलता है। यानि मोबाईल , मस्ल्स और मोटरबाईक। मेरे पास तो चंद चने के दाने और राय जी के दो रुपये वाले बिस्कुट के सिवा कुछ नहीं होता। फिर ये प्रगाढ़ प्यार मुझे कैसे मिला। लेकिन इतना तो है कि जो प्यार सिर्फ एक दूसरे के एहसास से उपजे और टिके उसमें भी चंद बातें ऐसी शामिल होती है जिसे सुनकर कोई आश्चर्य करे। सच्चे प्यार में भी इष्या , द्वेष ,द्रोह और उलाहना शामिल होती है। मैने तो साफ महसुस किया है। अभी कितना दिन हुआ। एक सप्ताह नहीं बीता होगा। रोज की तरह काम से थोड़ा सा समय चुराकर पेड़ के नीचे पहुंचा था..राय जी बेचारे देखते हीं दो रुपये वाले दो विस्कुट लेकर खड़े थे। मंटू जी पान वाले कह रहे थे। आज लेट आये सर। सबलोग नीचे आया था। कुछ नहीं मिला भाग गये। मैं दौड़कर पेड़ के पास गया और पेड़ के बीच प्राकृतिक रुप से बन चुके एक गढ्ढ़ेनुमा कंदरा जो थोड़ा सपाट भी है उसमें बिस्कुट डालने लगा और उन्हे बुलाने लगा। कोई नहीं आया। एक गिल्लो आई और बस एक टुकड़ा लेकर चली गई फिर कोई नहीं आया। मंटू जी ने कहा ..सब खिसिया गया है सर।
सचमुच उस पेड़ के नीचे मानो इधर उधर से मुझे कोई कह रहा था। क्या मजाक बना लिये हैं रोज रोज सिर्फ राय जी का बिस्कुट और कुछ नहीं दिखता बाजार में। दुसरे दिन मैं समय पर गया लेकिन हाथ में उसदिन अशोक राजपथ का पीरबहोर वाला भुट्टा हाथ में था। लेकर आया और मुंह से सिर्फ इतना ही निकला सी..सी..मानों मेरी आवाज का हीं इंतजार था। मेरे से डेढ़ किलोमीटर दूर से भागी चली आ रही थीं गिल्लो। भुट्टे का एक दाना उठाना फिर मेरी ओर देखना और उसके बाद उसे प्यार से कुतरना। दोनो भुट्टे तबतक मैं उनके आसपास छीट चुका था, वो खा रहीं थीं। राय जी भी हंस रहे थे। फिर क्या था उनके एक उलाहने ने मुझे बदलाव की तरफ मोड़ दिया। अब तो स्थिति ये है कि बीना उनको कुछ दिये मैं अपना टिफिन तक नहीं खोल सकता लगता है कहीं कोई पेड़ से मुझे देख रहा है। अब तो रोजाना मुर्ही,चूरा,चना और मकई के दाने ले जाने पड़ते हैं। एक दिन उनके पास नहीं जाना मतलब शाम तक मन खट्टा सा रहता है। दिन और रात मिलाकर इंसान अपने कई पलों में बेहद खुश रहता है फिर कई पल वह अपने काम को लेकर संतुष्ट होने पर खुश रहता है। लेकिन यह कौन सी खुशी है कि उनका एक दाना खाना और मेरे चेहरे पर एक अलग तरह की खुशी और गर्व का आ जाना यह क्या है। लेकिन मैने जो महसूस किया है..... वो है उनको अपने हाथों को मोड़कर खाते हुए देखना मुझे दुनियां की सबसे बड़ी सफलता खुशी और संतुष्टी मिलती है। एकाध मित्रों ने बड़ी कोशिश की ..मैं वहां बैठकर उन्हे खिलांउ और वो मुझे विजुअलाईज करें। लेकिन मैने मना कर दिया। मुझे हमेशा डरता भी हूं मुझसे उनका कोई प्यार न छीने। मेरे आसपास कोई और खड़ा रहे तो वो लगता है ईष्या से जल रही हैं क्योंकि उस समय वो जल्दी से सबकुछ खाना चाहती हैं। लेकिन मेरे अकेले रहने पर उनके चेहरे पर मुस्कुराहट रहती है। मुझे सबसे बड़ा सुख तो उस दोपहर को मिला था जब दो गिल्लों ने मिलकर मेरे हाथों पर प्रजनन को अंजाम दिया था। पूरे तीस से चालीस मिनट तक। पहली बार पता चला की इनके प्रजनन का समय लंबा होता है। इस दौरान सिर्फ इनकी सांसे चलती हैं शरीर में कोई हरकत नहीं होती। उनकी वजह से काफी देर तक मैं उकड़ु बैठा रहा।
मैं उनके एहसास को महसुस करते हुए जीना चाहता हूं। अभी उनकी संख्या 75 से 80 है लेकिन उस पेड़ के नीचे बैठने वालों की संख्या बढ़ गई है इसलिए ज्यादा संख्या में वह कम ही आ पाती हैं। कई बार कुछ लोगों ने मेरे बड़ों से शिकायत भी कर दी की ये काम करने जाते हैं तो गिलहरियों को दाना खिलाते हैं। कंपनी का समय नष्ट होता है। लेकिन अभी तक मुझसे किसी ने कुछ नहीं कहा है..और वैसे भी मैं मानने वाला कहां हूं........क्योंकि प्रभाष जी ने अपने पटना प्रवास के दौरान कहा था कि बाबु सबकुछ छोड़ देना इन गिलहरियों को नहीं। अंत में मैं दोस्ती की कुछ पंक्तियां यहां उदृत करना चाहूंगा......मुझे दोस्ती के उपर लिखी कुछ पक्तियां याद आ रही थी। किसी ने पूछा दोस्ती क्या है.....। मैंने कहा दोस्ती ढाई आखर है.... उसने कहा ये ढाई आखर क्या है.... मैंने कहा प्रेम है...... उसने कहा प्रेम क्या है.... मैंने कहा निस्वार्थता है... उसने कहा ये निस्वार्थता क्या है... मैंने कहा अपनापन है... असीमितता है... ।...................................................................................................................................................

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