Thursday, August 27, 2009



संगीत के सागर को समेटने के लिये कोई शार्ट कार्ट नहीं होता।...
आशुतोष जार्ज मुस्तफा।
भातरतीय संगीत की संस्कृति में अनूठे तार जोड़कर उसे विश्वपटल पर रिदम देने वाले एक शख्स स्पिक मैके नाम की संस्था के बुलावे के दौरान गत दिनों पटना में थे। ग्रेमी अवार्ड,पद्मश्री के साथ बहुत सारे पुरस्कारों से नवाजे गये मोहन वीणा के जन्मदाता विश्वमोहन भट्ट। जिनके पास आकर शास्त्रीय संगीत एक मुकाम पर पहुंचता है। उन्होंने मोहन वीणा और शास्त्रीय संगीत के अनछुये पहलुओं की चर्चा की। जिसमें कुछे खट्टी मिठ्ठी बातें भी शामिल थी...........प्रस्तुत है एक्सक्लूसिव बातचीत।

............सबसे पहले मोहन वीणा के बारे में बताएं।
मुस्कुराते हुए....देखिये मोहन वीणा केवल वीणा ही नहीं बाकी के वाद्ययंत्रों से भी काफी अलग है। कारण ये हैं कि इसमें मैने संगीत की आत्म को डाला है। वैसे समान्यतया वीणा में 12 तार होते हैं। यह देखने में गिटार की बाडी से थोड़ा अलग दिखता है। जो 12 तार हैं वे भारतीय शास्त्रीय संगीत के आधार स्तंभ हैं।
उन बारह तारों के अलावा हमने इसमें 8 तार डाले हैं। मोहन वीणा में एक ही तुम्बा होता है। जबकि आम वीणा में दो तुम्बें होते हैं। इन 8 तारों के जरिये मैने इसमें गायकी अंक का समावेश किया है,जिसे डालना मेरा सपना कह सकते हैं।

..............वीणा के बक्से पर एअरलाईंस का स्टीकर...क्या मतलब है।
ओ हो......ये जो आप दुनिया के दर्जनों एअरलाईंस के स्टीकर चिपके देख रहे हैं..यह कहानी कहता है मोहनवीणा के सफर की। जो आसमान से होते हुए दुनियां की कई सरजमीं पर इसने शास्त्रीय संगीत के सुर सजाए हैं। और मैं जहां जाता हूं ,जिस एअरलाईंस से जाता हूं वीणा के बक्से पर उसका स्टीकर चिपकाना नहीं भूलता।
..............क्या लगता है जब आज भी शास्त्रीय संगीत की पहचान किसी राजघराने से जोड़कर देखी जाती है।
................देखिये ऐसा बिल्कुल नहीं है। ऐसा नहीं है कि शास्त्रीय संगीत के उपासक और उसे आत्मसात करनेवाले। उसे समझनेवाले केवल राजघराने से ही आते हैं। राजघराने तक सिमटना या घराने से पहचान होना अब दूर की बात हो गई। राजघराने के बाहर से आनेवालों ने भी काफी नाम कमाया है। इस क्षेत्र में कई युवा आये हैं जिनका संबंध दूर दूर तक राजघराने से नहीं है।

...............क्या लगता है जैसे वेस्टर्न और चालू संगीत हावी हो रहा है..शास्त्रीय संगीत को किसी संरक्षण की जरुरत है।
................मैं ऐसा नहीं मानता । आज का दौर संगीत के लिये एक गोल्डेन इरा है। आज आपके पास हाईटेक टेक्नोलाजी है, आप उसे कभी भी अलग तरीके से पेस करके इंटरेस्टेड बना सकते हैं। इंटरनेट,रिटलिटी शोज। एक्सपोजर के ढ़ेर सारे मौके हैं। जहां से आपको हाथों हाथ लिया जा सकता है।
माध्यम बढ़े हैं थोड़ी सी प्रतिभा होगी तो निखरकर सामने आ जाएगी।

..............संगीत को आत्मसात करने का तरीका और गुरु की भूमिका के बारे में बताएं।
.............देखिये गुरु की भूमिका हर क्षेत्र में महत्वपूर्ण होती है और यह बात शास्त्रीय संगीत में जोरदार तरीके से लागू होती है। यदि लोग शार्ट कार्ट का तरीका छोड़ दें तो इसे साधना और तपस्या से भी जल्दी पा सकते हैं। सबकुछ पा लेने की जल्दी गल्मराईज्ड,हो जाने की बेताबी है। संगीत में नीमहकीम का दौर यहीं से शुरु होता है। शास्त्रीय संगीत के निठल्ले गुरु यहीं से सिखने वालों पर हावी हो जाते हैं।
.....................वह राग जो आपकी आत्मा छु लेती हो।
.................मधुवंती। जब यह राग शुरु होती है तो लगता है आत्मा की खुराक पूरी हो गई है।
.............अंतिम सवाल....दूसरा विश्वमोहन भट्ट कहा तैयार हो रहा है।
.............हर जगह हो सकता है...हंसते हुए...इंसान यदि कुछ बनने पर तुले तो अपनी मेहनत से वह सबकुछ हासिल कर सकता है चाहे वह संगीत की दुनियां का मोहनवीणा हो या सरस्वती के हाथों में सजी वीणा। बस लग्न तपस्या और इमानदारी से किया गया रियाज संगीत की रिढ़ होती है।

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