
शहनाई के शाहंशाह की सिसकती धरती।
(बिस्मिल्लाह खां के पुण्यतिथि 21 अगस्त पर विशेष)
दिल्ली से आ रहे हैं एक्सप्रेस ट्रेन से तो बक्सर उतर जाईए। अगर पटना के तरफ से जा रहे हैं तो डुमरांव स्टेशन पर उतर जाईए। यह डुमरांव है। वहीं डुमरांव जिसकी माटी ने एक ऐसे लाल को जन्म दिया जिसने तुरही को शहनाई के दर्द का मानक बनाते हुये देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी उसे एक सम्मान दिलवाया। आज उनकी धरती पूरी तरह सिसक रही है। वो जबतक जीवित रहे कहते रहे कि जन्मभूमी का दर्जा स्वर्ग के बराबर होता है। अपने लोग तो उसी माटी में जन्में उनके गांव से मात्र आठ किलोमीटर डुमरांव प्रखंड के कचईनियां गांव में। डुमरांव पढ़ने आते थे । कभी लगा नहीं कि आजादी के साठ साल बाद भी गंदगी की ढेर पर बसा और राजनीतिक रुप से जातिवाद का मुख्य अड्डा बन चुका डुमरांव विधानसभा क्षेत्र शहनाई के शेर की धरती है। जब पता
चला तो बहुत देर हो चुकी थी। डुमरांव में उनका पैतृक निवास उपेक्षित है। स्थानिय प्रशासन की उपेक्षा की वजह से भूमाफियों की नजर उनके आशियाने पर पड़ चुकी है। इतना ही नहीं उनकी धरती को यादगार बनाने के वादे बहुत हुए लेकिन अब तो सुनने में आ रहा है कि उनकी जन्भूमि का सौदा भी होने वाला है। हालाकि यह चर्च चंद बुद्दिजीवियों के डर का अफवाह भी हो सकती है लेकिन ऐसा हो ही गया तो क्या करेगी सरकार।
अपने लोगों के एक दोस्त और स्थानीय स्तर पर सरोकार की पत्रकारिता करनेवाले मुरली मनोहर श्रीवास्तव बताते हैं कि.........डुमरांव के एक अति गरीब परिवार 21 मार्च 1916 को उस्ताद का जन्म हुआ था। उस्ताद के अब्बा जान पैग्बर बख्स उर्फ बचई मिय़ां अपने कमरुद्दीन को बड़ा अधिकारी बनाना चाहते थे। अब्बा बक्सर जिले के डुमरांव महाराज के दरबार में दरबारी बादक हुआ करते थे। वहां भी बच्ची मियां शहनाई ही बजाया करते थे। राजदरबार में कोई उत्सव हो और बच्ची मियां नहीं आयें भला कैसे हो सकता है। इसी माहौल में पले बढ़े कमरुद्दनी ने शहनाई के शेर बनने के वो गुर सीखे जिसने राष्ट्रीय पटल पर दर्द का एक ऐसा इतिहास लिखा जो आगे चलकर राषट्रपति भवन तक गूंजता रहा। लेकिन आज उनका अपना धर दर्शनीय स्थल बनने की वजाए उदास है। कोई ध्यान नहीं है। स्थानीय विधायक को जातिगत राजनीति से फुर्सत नहीं तो कोई समाजिक संस्था भी आगे नहीं बढ़ पाई।
डुमरांव के कुछ बुजूर्ग बताते हैं कि उस्ताद बचपन में एक बार अपने मामा अली बख्स के साथ वाराणसी गये। उसके बाद उन्हे 14 साल की उम्र में पहली बार इलाहाबाद में बासुरी बजाने का मौका मिला फिर उस्ताद ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
मामू की मौत ने बीच में उस्ताद को एक पल के लिए विचलित किया लेकिन बाद में वो फिर संभले।
उस्ताद ने भोजपूर की माटी को भी समृद्द किया और .....एही मटिया में भुलाईल हमा
र मोतिया हो रामा...............जैसी अनेक दर्द भरी रचनाएं उन्हीं की देन रही। आज भी उनकी धुन विश्व के कोने कोने में गूंज रही है। लेकिन कहीं न कहीं उनकी आत्मा अपने ही जन्मभूमि की हालत पर रो रही है। उस्ताद इसी महीने की 21 तारीख को 2006 में 2. 20 मिनट पर हमें अलविदा तो कह गये। लेकिन उनकी धुन आज भी डुमरांव की गलियों और राजधराने के बचे हुए हिस्से में गुंजती है .................जरुरत है सिर्फ उसे ध्यान से सुनने की।
आशुतोष जार्ज मुस्तफा।
(बिस्मिल्लाह खां के पुण्यतिथि 21 अगस्त पर विशेष)
दिल्ली से आ रहे हैं एक्सप्रेस ट्रेन से तो बक्सर उतर जाईए। अगर पटना के तरफ से जा रहे हैं तो डुमरांव स्टेशन पर उतर जाईए। यह डुमरांव है। वहीं डुमरांव जिसकी माटी ने एक ऐसे लाल को जन्म दिया जिसने तुरही को शहनाई के दर्द का मानक बनाते हुये देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी उसे एक सम्मान दिलवाया। आज उनकी धरती पूरी तरह सिसक रही है। वो जबतक जीवित रहे कहते रहे कि जन्मभूमी का दर्जा स्वर्ग के बराबर होता है। अपने लोग तो उसी माटी में जन्में उनके गांव से मात्र आठ किलोमीटर डुमरांव प्रखंड के कचईनियां गांव में। डुमरांव पढ़ने आते थे । कभी लगा नहीं कि आजादी के साठ साल बाद भी गंदगी की ढेर पर बसा और राजनीतिक रुप से जातिवाद का मुख्य अड्डा बन चुका डुमरांव विधानसभा क्षेत्र शहनाई के शेर की धरती है। जब पता
चला तो बहुत देर हो चुकी थी। डुमरांव में उनका पैतृक निवास उपेक्षित है। स्थानिय प्रशासन की उपेक्षा की वजह से भूमाफियों की नजर उनके आशियाने पर पड़ चुकी है। इतना ही नहीं उनकी धरती को यादगार बनाने के वादे बहुत हुए लेकिन अब तो सुनने में आ रहा है कि उनकी जन्भूमि का सौदा भी होने वाला है। हालाकि यह चर्च चंद बुद्दिजीवियों के डर का अफवाह भी हो सकती है लेकिन ऐसा हो ही गया तो क्या करेगी सरकार।अपने लोगों के एक दोस्त और स्थानीय स्तर पर सरोकार की पत्रकारिता करनेवाले मुरली मनोहर श्रीवास्तव बताते हैं कि.........डुमरांव के एक अति गरीब परिवार 21 मार्च 1916 को उस्ताद का जन्म हुआ था। उस्ताद के अब्बा जान पैग्बर बख्स उर्फ बचई मिय़ां अपने कमरुद्दीन को बड़ा अधिकारी बनाना चाहते थे। अब्बा बक्सर जिले के डुमरांव महाराज के दरबार में दरबारी बादक हुआ करते थे। वहां भी बच्ची मियां शहनाई ही बजाया करते थे। राजदरबार में कोई उत्सव हो और बच्ची मियां नहीं आयें भला कैसे हो सकता है। इसी माहौल में पले बढ़े कमरुद्दनी ने शहनाई के शेर बनने के वो गुर सीखे जिसने राष्ट्रीय पटल पर दर्द का एक ऐसा इतिहास लिखा जो आगे चलकर राषट्रपति भवन तक गूंजता रहा। लेकिन आज उनका अपना धर दर्शनीय स्थल बनने की वजाए उदास है। कोई ध्यान नहीं है। स्थानीय विधायक को जातिगत राजनीति से फुर्सत नहीं तो कोई समाजिक संस्था भी आगे नहीं बढ़ पाई।
डुमरांव के कुछ बुजूर्ग बताते हैं कि उस्ताद बचपन में एक बार अपने मामा अली बख्स के साथ वाराणसी गये। उसके बाद उन्हे 14 साल की उम्र में पहली बार इलाहाबाद में बासुरी बजाने का मौका मिला फिर उस्ताद ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
मामू की मौत ने बीच में उस्ताद को एक पल के लिए विचलित किया लेकिन बाद में वो फिर संभले।
उस्ताद ने भोजपूर की माटी को भी समृद्द किया और .....एही मटिया में भुलाईल हमा
र मोतिया हो रामा...............जैसी अनेक दर्द भरी रचनाएं उन्हीं की देन रही। आज भी उनकी धुन विश्व के कोने कोने में गूंज रही है। लेकिन कहीं न कहीं उनकी आत्मा अपने ही जन्मभूमि की हालत पर रो रही है। उस्ताद इसी महीने की 21 तारीख को 2006 में 2. 20 मिनट पर हमें अलविदा तो कह गये। लेकिन उनकी धुन आज भी डुमरांव की गलियों और राजधराने के बचे हुए हिस्से में गुंजती है .................जरुरत है सिर्फ उसे ध्यान से सुनने की।आशुतोष जार्ज मुस्तफा।

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