समझा.........................
आशुतोष जार्ज मुस्तफा.................।
आज दोनों के चेहरे की खुशी देखते बन रही थी।
वे दो ही थे.....................।
कंधे पर कचड़े का बोरा उठाये हुए..।
इनका परिचय भी काफी रोचक है।
ये अंधी आधुनिकता में पैदा हुए संस्कृतिविहीन पीढ़ी के पाप थे।
जिसे अपनी इलिट्ता छुपाए रखने के लिए कहीं फेका गया था।
वो गनिमत उस गली के कुते की जो इन मांस के लोथड़ों को सुंघकर छोड़ दिया।
इनका घर भी उन अपार्टमेंटों के गलियों में था।
जब भूख लगती थी तो उसी खिड़की की ओर देखते थे।
शायद कोई रोटी का टूकड़ा फेक दे....।
जहां से उन्हे मांस के लोथड़े के रुप में फेका गया था।
लेकिन आज रोटी नहीं फेकी गई..।
उपर से गिरे थे कंड़ोम के कुछ फटे अवशेष...।
थू..थू कर निकल भागे थे हंसते हुए बोरे लेकर।
अरे यह क्या...... आज तो दिवस है....।
कौन सी यार....................।
अरे वहीं अपने जैसे बच्चों के लिए बाल दिवस..।
पहुंच गये थे वहां जहां दिवस पर कार्यक्रम हो रहा था।
पिछवाड़े खड़े थे..................।
जहां उत्सव के बाद फेके जाने थे जूठन।
टकटकी लगाकर डूब चुके थे नान और अधखायी रोटी की कल्पना में।
आज जरुर कुछ अच्छा खाने को मिलेगा...।
थोड़ी देर बाद..धपाक से कुछ गिरा..।
दोनों दौड़े थे उस ओर ..................।
लेकिन यह क्या इनसे पहले तो वहां वो पहुंच गये थे।
कुते.................। गलियों के आवारा कुते..........।
जो न जाने कब से टकटकी लगाए बैठे थे।
काफी गर्व से खाते हुए कुते अपने अंदाज में शायद कह रहे थे।
बच्चू जब तेरी मां ने तुझे फेका था....।
तब इसी दिन के लिए हम सुंघकर छोड़ दिए थे।
समझा..................................।
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