आशुतोष जार्ज मु्स्तफा..............।
दुनियां का सारा काम छोड़ देना...अपनी गिलहरियों को मत भूलना। पटना में जून महीने में हुई प्रभाष जी के साथ मुलाकात में - हंसते हुए उन्होंने यह बातें मुझस कही थी। यह वह समय था जब मैं इटीवी छोड़कर भविष्य में आने वाले एक चैनल में बतौर रिपोर्टर जुड़ा था। पटना के गांधी संग्रहालय के वरिष्ठ गांधीवादी रजी साहब ने मुझे फोन कर बताया था कि आपके सदाबहार चहेते आ रहे हैं, और मैं उस दिन से पूरी तैयारी में लग गया था कि..........इस बार तो मिलूंगा हीं। मुझे याद आने लगे उनके सभी कागद कारे जब मैं ग्रेजुएशन के दौरान अपने बड़े भाई से छुपाकर प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी की वजाए उनका कागद कारे जरुर पढ़ता था। रविवार को ब्लैक एंड ह्ववाइट जनसत्ता के साथ सबरंग की मिलता था। बाद में मैने उनके कागद कारे का संकलन..... धन्न नरबड़ा मईया,जीने के बहाने ,तोप मुकाबील हो...इन सभी को मैने खरीद लिया। मुझे दिल्ली शक्करपुर के रिक्शा वाले भी याद आ रहे थे जिसका जिक्र उन्होंने कागद कारे में किया था। मैं मन ही मन सोच रहा था कि पुछूंगा उनसे कि आज किसी संपादकीय पेज पर रिक्शे वाले शब्दों के रुप में क्यों नहीं दिखते। बहुत सारे सवाल थे। सबसे बड़ी इच्छा थी उन्हें छुने की। लेकिन कोटि कोटि धन्यवाद रजी साहब का कि उन्होंने स्पेशली हमसे तीस मिनट मिलवा दिया। वह तीस मिनट मेरे लिए क्या लेकर आया और क्या देकर चला गया इसे शब्दों में पीरोने की ताकत मुझमें नहीं है। उनके साथ मेरी तस्वीरें उनसे लाईव बातचीत । मेरा तो सपना हीं पूरा हो गया। लेकिन अब घर में उनकी तस्वीर वाली पुस्तक देखने पर आंखों में आंसु भर जाते हैं। आंसु गीरते नहीं लेकिन कुछ देर तक भरे रहते हैं। उनके आने को लेकर मैं बहुत एक्साईटेड था मन में बहुत सारी बातें चल रही थीं। मैं उनसे बात भी जरुर करुगां। जून में 12 तारीख को गांधी संग्रहालय में पत्रकारिता के वर्तमान स्वरुप पर गोष्ठी थी। कार्यक्रम में जोशी जी के अलावा आज भी पत्रकारिता और अपने शब्दों के जरिए समाज में वैचारिक क्रांति लाने के प्रयाश में दिन रात एक किए प्रभात खबर के संपादक हरिवंश जी भी थे। उन्हें पहले मै पुस्तक मेले में पुण्य प्रसुन बाजपेयी के साथ थोड़ा सुन चुका था .......इस गोष्ठी में उनके प्रतिबद्द संकल्प को विस्तार से सुना। उनकी मेरे प्रति आत्मीयता मेरे लिए आज भी यादगार है। मैं अपने नये चैनल की ओर से डंडा यानि लोगो और कैमरे के साथ वहां पहुंचा। सबसे पहले तो मैने उन्हें गौर से निहारा.......कैसे हैं वे कैसे दिखते हैं...वैसे मैने कई टेलिविजन कार्यक्रमों में और किताबों में उनकी तस्वीर देखी थी लेकिन सामने थे तो सिर्फ उन्ही को देखने का मन कर रहा था। अपने निजी अनुभवों,व्यक्तिगत जीवन की बातों को पत्रकारिता की आत्मा बना देने की कला की प्रतिमूर्ति मेरे सामने थे। गांधी संग्रहालय में काफी संख्या में लोगों की भीड़ थी। मुझे जहां तक याद है , उनसे मीडिया की भाषा में जिसे टिक टैक कहते हैं ...करने वाला अंतिम पत्रकार हूं। जिससे उन्होंने मानवीय संवेदनशीलता और परकाया प्रवेश को पत्रकारिता का अंग बताते हुए कई गंभीर मामलों पर सवाल जबाब किया। वहीं पर ईटीवी द्वारा उन्हें बिहार के स्थानीय स्टूडियों में आने का आग्रह किया गया समय की कमी की वजह से वे नहीं जा सके। पटना में उस दिन उन्होंने गोष्ठी में हिंदी पत्रकारिता के कई बड़े संस्थानों की धोती उतार दी। प्रभाष जी ने एडवरटोरियल में शामिल तमाम संपादकों और मालिकों को कटघरे में खड़ा करते हुए उन्हें धोखेबाज और पत्रकारिता का बेईमान तक कहा। पत्रकारिता जैसे पवित्र कार्य में पैसे को सबकुछ मानने वाले संपादकों को उन्होंने सलाह तक दी कि यदि पैसा ही कमाना है तो और भी बाकी धंधे भरे पड़े हैं। उन्होंने जो कहा कई लोगों को तीखा भी लगा। कई लोगों ने क्रास क्वेस्चन किए सभी का उन्होंने जबाब दिया। हालाकि मैनें उनसे बहुत सारी बातें की, लेकिन जो बाते उन्होंने जोर देकर कहीं उसे हूबहू लिख रहा हूं......पत्रकारिता में बीना संवेदनशीलता और बीना परकाया प्रवेश के पत्रकारिता हो हीं नहीं सकती। परकाया प्रवेश यानी जैसा आप महसूस करते हैं वैसा मैं करने लगूं। पीर पराई जाने रे। इसके वैगर कोई पत्रकारिता करने की बात करता है तो वह पत्रकार नहीं है। जिज्ञासा और सहानभूति के बीना कोई पत्रकार नहीं हो सकता। किसी भी मानवीय कार्य को बीना परकाया प्रवेश के नहीं किया जा सकता। आज भी पत्रकारिता एक मानवीय गतिविधि है । कई तथाकथित बड़े अखबारों में ग्रास रुट की खबरों की वजाए मैनकाईंड और किसी तेल और परफ्यूम या फिर नेता का विज्ञापन देखकर अफसोस होता है....हमलोग बोल नहीं सकते ...कोई बोल तो रहा था..... जिसे हम सुन रहे थे। लेकिन अब उनकी रुह...... उनका एहसास..... एक हिम्मत दे रहा है। मुझे अब कुछ नहीं चाहिए मैं गिलहरियों से मिलने जा रहा हूं।
दुनियां का सारा काम छोड़ देना...अपनी गिलहरियों को मत भूलना। पटना में जून महीने में हुई प्रभाष जी के साथ मुलाकात में - हंसते हुए उन्होंने यह बातें मुझस कही थी। यह वह समय था जब मैं इटीवी छोड़कर भविष्य में आने वाले एक चैनल में बतौर रिपोर्टर जुड़ा था। पटना के गांधी संग्रहालय के वरिष्ठ गांधीवादी रजी साहब ने मुझे फोन कर बताया था कि आपके सदाबहार चहेते आ रहे हैं, और मैं उस दिन से पूरी तैयारी में लग गया था कि..........इस बार तो मिलूंगा हीं। मुझे याद आने लगे उनके सभी कागद कारे जब मैं ग्रेजुएशन के दौरान अपने बड़े भाई से छुपाकर प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी की वजाए उनका कागद कारे जरुर पढ़ता था। रविवार को ब्लैक एंड ह्ववाइट जनसत्ता के साथ सबरंग की मिलता था। बाद में मैने उनके कागद कारे का संकलन..... धन्न नरबड़ा मईया,जीने के बहाने ,तोप मुकाबील हो...इन सभी को मैने खरीद लिया। मुझे दिल्ली शक्करपुर के रिक्शा वाले भी याद आ रहे थे जिसका जिक्र उन्होंने कागद कारे में किया था। मैं मन ही मन सोच रहा था कि पुछूंगा उनसे कि आज किसी संपादकीय पेज पर रिक्शे वाले शब्दों के रुप में क्यों नहीं दिखते। बहुत सारे सवाल थे। सबसे बड़ी इच्छा थी उन्हें छुने की। लेकिन कोटि कोटि धन्यवाद रजी साहब का कि उन्होंने स्पेशली हमसे तीस मिनट मिलवा दिया। वह तीस मिनट मेरे लिए क्या लेकर आया और क्या देकर चला गया इसे शब्दों में पीरोने की ताकत मुझमें नहीं है। उनके साथ मेरी तस्वीरें उनसे लाईव बातचीत । मेरा तो सपना हीं पूरा हो गया। लेकिन अब घर में उनकी तस्वीर वाली पुस्तक देखने पर आंखों में आंसु भर जाते हैं। आंसु गीरते नहीं लेकिन कुछ देर तक भरे रहते हैं। उनके आने को लेकर मैं बहुत एक्साईटेड था मन में बहुत सारी बातें चल रही थीं। मैं उनसे बात भी जरुर करुगां। जून में 12 तारीख को गांधी संग्रहालय में पत्रकारिता के वर्तमान स्वरुप पर गोष्ठी थी। कार्यक्रम में जोशी जी के अलावा आज भी पत्रकारिता और अपने शब्दों के जरिए समाज में वैचारिक क्रांति लाने के प्रयाश में दिन रात एक किए प्रभात खबर के संपादक हरिवंश जी भी थे। उन्हें पहले मै पुस्तक मेले में पुण्य प्रसुन बाजपेयी के साथ थोड़ा सुन चुका था .......इस गोष्ठी में उनके प्रतिबद्द संकल्प को विस्तार से सुना। उनकी मेरे प्रति आत्मीयता मेरे लिए आज भी यादगार है। मैं अपने नये चैनल की ओर से डंडा यानि लोगो और कैमरे के साथ वहां पहुंचा। सबसे पहले तो मैने उन्हें गौर से निहारा.......कैसे हैं वे कैसे दिखते हैं...वैसे मैने कई टेलिविजन कार्यक्रमों में और किताबों में उनकी तस्वीर देखी थी लेकिन सामने थे तो सिर्फ उन्ही को देखने का मन कर रहा था। अपने निजी अनुभवों,व्यक्तिगत जीवन की बातों को पत्रकारिता की आत्मा बना देने की कला की प्रतिमूर्ति मेरे सामने थे। गांधी संग्रहालय में काफी संख्या में लोगों की भीड़ थी। मुझे जहां तक याद है , उनसे मीडिया की भाषा में जिसे टिक टैक कहते हैं ...करने वाला अंतिम पत्रकार हूं। जिससे उन्होंने मानवीय संवेदनशीलता और परकाया प्रवेश को पत्रकारिता का अंग बताते हुए कई गंभीर मामलों पर सवाल जबाब किया। वहीं पर ईटीवी द्वारा उन्हें बिहार के स्थानीय स्टूडियों में आने का आग्रह किया गया समय की कमी की वजह से वे नहीं जा सके। पटना में उस दिन उन्होंने गोष्ठी में हिंदी पत्रकारिता के कई बड़े संस्थानों की धोती उतार दी। प्रभाष जी ने एडवरटोरियल में शामिल तमाम संपादकों और मालिकों को कटघरे में खड़ा करते हुए उन्हें धोखेबाज और पत्रकारिता का बेईमान तक कहा। पत्रकारिता जैसे पवित्र कार्य में पैसे को सबकुछ मानने वाले संपादकों को उन्होंने सलाह तक दी कि यदि पैसा ही कमाना है तो और भी बाकी धंधे भरे पड़े हैं। उन्होंने जो कहा कई लोगों को तीखा भी लगा। कई लोगों ने क्रास क्वेस्चन किए सभी का उन्होंने जबाब दिया। हालाकि मैनें उनसे बहुत सारी बातें की, लेकिन जो बाते उन्होंने जोर देकर कहीं उसे हूबहू लिख रहा हूं......पत्रकारिता में बीना संवेदनशीलता और बीना परकाया प्रवेश के पत्रकारिता हो हीं नहीं सकती। परकाया प्रवेश यानी जैसा आप महसूस करते हैं वैसा मैं करने लगूं। पीर पराई जाने रे। इसके वैगर कोई पत्रकारिता करने की बात करता है तो वह पत्रकार नहीं है। जिज्ञासा और सहानभूति के बीना कोई पत्रकार नहीं हो सकता। किसी भी मानवीय कार्य को बीना परकाया प्रवेश के नहीं किया जा सकता। आज भी पत्रकारिता एक मानवीय गतिविधि है । कई तथाकथित बड़े अखबारों में ग्रास रुट की खबरों की वजाए मैनकाईंड और किसी तेल और परफ्यूम या फिर नेता का विज्ञापन देखकर अफसोस होता है....हमलोग बोल नहीं सकते ...कोई बोल तो रहा था..... जिसे हम सुन रहे थे। लेकिन अब उनकी रुह...... उनका एहसास..... एक हिम्मत दे रहा है। मुझे अब कुछ नहीं चाहिए मैं गिलहरियों से मिलने जा रहा हूं।

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