Wednesday, August 12, 2009

सिसकता बचपन
रोजाना कई चेहरे सामने से गुजरते हैं। छोटे शहरों में ये आमतौर पर देखने में आता है कि कई बार कुछ चेहरे एक सप्ताह के अंदर आपको दुबारा दिखाई पड़ जाए। चाहे वो बाजार में हो या फिर टेलिफोन का बिल देते हुए जब आप लाईन में हों । कई बार तो ट्रेन में भी ऐसे चेहरे सामने आ जाते हैं। लेकिन कुछ चेहरे आपको रोजाना भी दिखाई देते हैं। जैसे चौराहे पर खैनीवाला, पानवाला और भी, जैसे दुधिया या फिर फुटपाथ का दुकानदार।
अपने को गांधी मैदान से होकर एक्जीविशन रोड़ जाते हुये एक चेहरा एक ही दिन दिखा। लेकिन उसने पूरी तरह झकझोर कर रख दिया। अगस्त 2008 की बात है......हम ईटीवी में स्ट्रींगर के रुप में काम करते हुये हमेशा .....आफिस जाने के लिये पटना के छज्जुबाग वाले रास्ते का प्रयोग करते थे। कारण ये था कि वह डाकबंग्ला चौराहे से होकर जाने में काफी परेशानी होती थी। छज्जुबाग का ईलाका मूलत सरकारी सेवकों और विधायकों के आवास से होकर गुजरता था और वहां जाम कम रहता था। ठीक सड़क से सटे एक बिहार सरकार में गन्ना मंत्री गौतम सिंह का घर था। मंत्री के घर की बाउड्री ठीक सड़क से सटकर होकर गुजरती है। मंत्री जी के कंम्पाउंड में कुछ आम के पेड़ थे जिसकी डाली बाउंड्री के पार होकर बिल्कुल सड़क पर आ जाती हैं।
सुबह के करीब 11 बजे होंगे............थोड़ी हल्की सी बारिश हो रही थी। मंत्री के आवास से गुजरते वक्त लगा कि थोड़ी देर रुक जाया जाए,शायद बारिश थोड़ी कम हो जाए। बीच सड़क पर ठहरने की सबसे माकूल जगह लगी.....मंत्रीजी की बाउंड्री। क्योंकि उसके ठीक उपर आम के पेड़ों का अच्छा झुरमुठ था। वहां खड़े रहकर हल्की बरसात से पूरी तरह बचा जा सकता था। थोड़ी देर वहां रुकने पर मंत्रीजी की बाउंड्री वाली दिवाल से सटकर बैठे हुये एक छोटी सी बच्ची दिखी। उम्र यहीं कोई 8 से 9 साल की होगी। उसके सामने ताड़ी की दो लबनी(मिट्टी का घुमावदार मटका) रखी हुई थी। उसमें लबालब ताड़ी भरी हुई थी........जो खजूर और ताड़ के पेड़ों से निकालकर रखी जाती है। हर दस मिनट के बाद कोई रिक्सा या फिर ठेलेवाला आ रहा था और बच्ची से एक गिलास ताड़ी मांगकर पिता था और बदले में पांच रुपये देकर जा रहा था। बच्ची अनमने भाव से सबको ताड़ी परोस रही थी। अभी बारिश चल ही रही थी। अचानक सड़क थोड़ी देर के लिये सुनसान पड़ गई....अपने भी हम चलने की तैयारी में लग रहे थे। लेकिन एकबार फिर बच्ची की तरफ नजर उठी क्योंकि हम उससे बीस फिट की दूरी पर खड़े थे। नजर उसकी तरफ गई तो दिमाग भन्ना उठा। एक लफंगा सा युवक उसके कुर्ते में हाथ डाले उसे झिझोड़ रहा था। तबतक मैनें बैग से कैमरा निकाल लिया था और पूरी हिम्मत के साथ रिकार्डिंग दबाकर उसकी ओर दौड़ा। उसके बाद युवकों ने बाईक पर बैठने के क्रम में जाते जाते उसके लबनी को पैरों से मार दिया। पूरी ताड़ी सड़क पर गिर गई थी। मैँ उसके पास गया। वहां जाकर मैने जो देखा उसे हर उस आदमी और सरकार को देखना चाहिये । क्योंकि उस बच्ची ने अपने आस पास सिसकते बचपन की ऐसी परिभाषा गढ़ दी थी। जिसे देखने के बाद अपने आपको इंसान मानने वाला हर व्यक्ति थोड़ी देर के लिये फ्रिज हो जाए।
उस बच्ची की दुनियां सड़क के किनारे मात्र पांच बाई पांच फिट के जगह में चल रही थी। उसकी पीठ दिवाल से सटी थी। सामने ताड़ी की दो लबनी। उसके साथ प्लास्टिक के दो गेदे गिलास। गिलास के उपर ताड़ी छानने के लिये प्लास्टिक की जाली से बना छानना रखा हुआ था। बच्ची के बाई ओर एक टूटे हुए थर्मोकाल के डब्बे में उसके पुरे बचपन का संसार रखा हुआ था। जो बचपन में सभी वैसे बनाते हैं। उसमें मिट्टी का गुड्डा गुडिया। मिट्टी का चुल्ला चौकी ,कड़ाही, बरतन, चौकी , बेलन, और गुड़्डे गुड़िया के जीवन से जुड़ी हुई सभी सामग्री मिट्टी से गढ़कर वहां रखी हुई थी। बच्ची से बातचीत करने पर पता चला कि वह दो युवक पटना के मंदिरी ईलाके के रहने वाले हैं उसके यहां हमेशा ताड़ी पीते हैं। मैने पुछा उनलोगों ने तुम्हारे कुर्ते में हाथ क्यों डाला। बच्ची ने कहा कि वे जब भी आते हैं ऐसा ही करते हैं।
उसके बाद मैनें जब वहां अपना कैमरा खोला तो उसने अपना चेहरा छुपा लिया। मैंने लाख उससे बात करनी चाही उसने कुछ नहीं कहा। बाद में मैं वहां से उसका चार मिनट का शाट लेकर चल पड़ा। आगे जाने पर एक पान की दुकान पर मैं रुका वहां मैनें उस बच्ची के बारे में चर्चा की तो पता चला यहा छज्जुबाग में ही रहती है। इसके पिता ताड़ी पेड़ों से उतारकर लाते हैं और मां कपड़े प्रेस करती है। बच्ची अपनी मां के साथ एक विधायक के कंपाउंड में गैरेज में रहती है। वह स्कूल नहीं जाती । वह ताड़ी बेचती है। यह भी पता चला कि जब वह बेचने से मना करती है तो उसे मार भी पड़ती है। बाद में मैं उसकी मां से जाकर मिला । मां से मैने कहा कि आप उसे ताड़ी बेचने के लिये सड़क पर क्यों बीठाती हैं। मां ने जो बताया उसे भी सुनकर दिल दहल उठा। लगा ही नहीं हम आजाद देश के वासी हैं.। गुलामी की जंजीरे टूट चुकी हैं। हम और हमारे देश के नागरिक चैन से रह सकते हैं। बच्ची की मां ने कहा बाबु ताड़ी नहीं बेचेगी तो क्या करेगी। हमलोग बेगूसराय के एक गांव में रहते थे। वहां रुबी के पिता ताड़ी उतारने का काम करते थे। पटिदार से झगड़ा हुआ झुठे केस में फंसा दिया गांववालों ने । उसके बाद विधायक जी ..............ने दया दिखाई और पटना लेकर आ गये.....यहीं उनके गैरेज में रहते हैं ....उनके कपड़े के साथ बाकी लोगों के कपड़े धोते हैं। रहने को मिल गया है। बच्ची ताड़ी बेच लेती है। बस जीवन कैसे भी चल रहा है।
मैं तुरंत इसी बात को लेकर पटना के जिला शिक्षा अधीक्षक शशि भूषण राय से मिला। उन्होने जो बाते बताई उसके मुताबिक रुबी जैसे बच्चों और बच्चियों के लिये सरकार विशेष स्कूलिंग योजना चला रही है ................जो कामकाजी हैं। या फिर स्कूल में आर्थिक अभाव के चलते नहीं आ पाते । इतना ही नहीं सरकार ने 2008 में शहर के स्टेशन और फुटपाथ पर इस तरह से रहने वाले बच्चों और अनाथ बच्चों को पढ़ाने और समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिये 22 लाख रुपये का आवंटन निदान नाम के एक गैरसरकारी संस्था को दिया था। लेकिन फिर हालात में कुछ तब्दिली नहीं दिख रही है।
इस मामले को लेकर मैं निदान में गया जहां से कहा गया कि सरकार ने पैसे तो दिये हैं लेकिन वह एरिया वाईज है और हमलोग छज्जुबाग में कुछ नहीं कर सकते। इसमें समाज और वैसे बच्चों को आगे आना होगा।
हम सभ्य समाज के कारिंदे हैं। भगवान ने इंसान बनाकर हमें धरती पर भेजा। लेकिन यहां हमलोग भैंस जैसी दिनचर्या में जीते हैं। सभी 24धंटे अपनी बीबी अपने बच्चे और अपनी बेटी अपने परिवार में जिंदा रहते हैं। 65 साल की औसत आयु है जैसे तैसे कट जाएगी। अधिकारी हैं तो कितनी भी महंगाई हो....राजमा धर में जाएगा हीं। बच्चे कार लेकर दारु पीने जाएंगे हीं। गांवों में भले समय पर अस्पताल नहीं पहुंचने की वजह से साल में हजारों लोग काल के गाल में समा जाते हों किसी को कुछ लेना देना नहीं। इतना ही नहीं नेता हैं तो लाल बती गाड़ी है...हरे भरे लान है बहुत सारे पैसे हैं भाड़ में जाए समाज और देश और फुटपाथ पर बैठने वाली रुबी। वैसी रुबियां बहुत जगह हैं।

ए0 जे 0 मुस्तफा।

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